Eni Lagni Ane Majja Tantra Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

Eni Lagni Ane Majja Tantra Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
Eni Lagni Ane Majja Tantra Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
एनी लागणी अने मज्जातंत्र
अने एनुं पारावार सौंदर्यझरणुं
अहल्या सरीखा स्थितप्रग्न थइ गयां छे

ए पहेलानी जेम हसती हती ए रीते
हवे जवल्ले हसी शके छे!

पहेला ज्यारे ए हसती त्यारे,
खळखळाट जलनादना ताले वहेती
उछळती ने कुदती नदी जेवी
लावण्यमय ने मनोहर लागती हती.

अने त्यारे

एनी स्फटिक सरीखी दंतपंकित
कोइ अवकाशी ग्रहनी जेम चमकी उठती

जाणे

निर्मळ अने तळीया जोइ शकाइ
एवा स्वच्छ पाणीमा सुर्यकिरणॉ
अठखेलिया खेली रह्या होय..

खबर नही!!
उदासीना चक्करमां एने
जात साथे
शरीर साथे
वान अने शान साथे
एनो पूरानो नातो खोइ बेठी छे!

खबर नही!एने शुं दुःख छे?
राम जाणे!?

अचानक मने याद आव्युं
अत्यारे तो कळयुग चाले छे

काश !
आ कळयूगमा कोइ राम आवे
अने,एनी अहल्यासरीखी
स्थितप्रग्न अवस्थाने स्पर्शीने
पहेलानी जेवी हती एवी बनावीने
समग्र चेतनाने फरी चेतनवंती करी दे

काश!
राम जेवी शकित मारा शब्दोमां होत तो?
मारा शब्दो एनी आंखो वाटे प्रवेसीने एना
समग्र शरीरनां तंत्रने हलबलावी नाखुं अने 
फरीथी बेहतरीन सौंदर्यनो साक्षातकार करी शकुं!

हमणा हमणा तुच्छ कविओ आवी
बहेतरीन अने आलादरजानी कल्पना करे शके छे

ओ कवि!
क्षुद्र अने पामर मनुष्य तुं क्यां 
अने पुरूषोमां उतम कही शकाइ
एवा भगवान रामचंद्रजी क्यां

कवि बोल्यो
छट!!
मने हवे बधी पौराणिक वातो रही रहीने
बकवाश लागे छे!!!
- नरेश के.डॉडीया
Advertisement