कविता हुं मारी रीते घडवा जांउ छुं Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

कविता हुं मारी रीते घडवा जांउ छुं Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
कविता हुं मारी रीते घडवा जांउ छुं Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
कविता हुं मारी रीते घडवा जांउ छुं
शब्दो रूपी माटी
शाही रूपी जळ
भेळवीने माटी जेवा भीना भीना
ए लोंदाने टेरवेथी मसळी मसळीने
नरम मुलायम पींड बनावुं छुं

ए पींडने विचारोनां चाकडा पर मुकुं छुं
घुमावुं छुं विचारोना चाकडाने
बस घुमावतो रहुं छुं

जेम
कुंभार जेम भीनी अने कठण माटीमां
टेरवा दबावीने माटीने कोइने कोइ आकारो आपे छे
अने बने छे
पाणी ठंडुं रहे एवुं माटलुं
दिवो जलावी शकाय एवुं कोळीयुं
वटेमार्गुनी तरस छीपावी शके एवी परबनी नांद
झाड-पौदाओने उछेरी शकाय एवा कुंडा
पंखीनी तरस छीपावे ए पाणी भरवाना कुंडा
ए सिवाइ बाळको रमी शके एवा माटीना रमकडा

बस ए रीते
टेरवा दबावी दबावी विचारोनां चाकडे फेरवी फेरवीने
ए मुलायम पींडमाथी नवा आकारो बनाव्ये जांउ छुं
सफेद कागळ पर ए बधा आकारोने गोठवतो जांउ छुं

जोनारा लोको मनगमता आकारोनां
शब्दोनी माटीना वासणॉ जोइने खूश थाय छे

अने कोइ आ वासणॉने जोइने उदास थाय छे
कोइ “वाह” तो कोइ”इर्शाद” कहीने
मारा कामने बीरदावे छे
अथवा
मने सौथी प्रिय एवी”टीका” करे छे

मने पेलो कुंभार याद आवे छे
पोतानी मस्तीमां गीत गाता गाता चाकडेथी पोताने
गमता अने लोकोने जोइए एवा आकारो बनावतो हतो
अने पोतानुं काम पुरुं थता
एना चहेरे खुशीनो परसेवो झाकळबिंदुं थइने चमकतो हतो

गझब हतो ए कुंभार…एनुं काम पुरुं थया बाद
ए न तो…”वाह – वाह” सांभळवा उभो रह्यो
ए न तो…”इर्शाद -इर्शाद”सांभळवा उभो रह्यो

कवि अने कुंभारनो बुनियादी फर्क कोइने समजाय तो कहेजो
- नरेश के.डॉडीया
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