साहित्य रसिक युवती Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

साहित्य रसिक युवती  Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
साहित्य रसिक युवती  Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
ए सांज मारे हैये लखाय गइ.
एक संस्कारीक रसिक युवतीनी साहित्यरसिकता,
व्यवाहरबुध्धि,साथे
आत्मगौरव अने अडगता अने आत्मविश्वास

साथे साथे एनी भयंकर एकलतांनी मने झांखी थइ हती.
परिचयनी साथे आत्मियता पमरतो बाग विकसतो रह्यो

वार्ताना प्रकरणोनी जेम रोज एने वांचतो रह्यो
ने प्रकरणे प्रकरणे नशाकारी रहस्यो खोलती रही
जेम शराब जुनो थाय एनो नशामां नमणाश वधती जाय
बस आवु ज कंइक एनु हतु…
हजु तो एक प्रकरणना नशामाथी बहार नीकळ्यो ना होउ ने
एक नवा प्रकरण रूपे सामे आवी जाय..

स्वलिखित एने जे कंइ गमे एवु वच्चे उमेरती रहे
क्यारेक लखे,”तमारी कल्पनामां एवो ते शु जादु छे?
के एमांथी नीकळी शकातु नथी.!!थोडॉ डर पण लागे छे,
आपणा बंनेमां घणु साम्य छे,
पण घणी वस्तुओ मारामां एवी छे के तमे तेने केम नीभावशो..?
हु साव नोखी माटीनी घडायेली छु.
मारो मिजाज,मारी मगरूरी,मारी सन्मान आपवानी रीत
शु तमे मने सहन करी शकशो?

मने मारा पर संपुर्ण विश्वास छे पण,
तमारा पर विश्वास राखता डर लागे छे..
मैत्री तो सरखानी ज टकी शके”
शु तमोने पहेलानी मारी जिंदगीनी खबर छे….?”

मे फक्त एटलु ज कह्यु,
“हु तमारी साथे आगळ वधवा मांगु छु,
कोइना भूतकाळमां हु फेरफार करी शकु एटलो सक्षम नथी,
पण हा,वर्तमान अने भविष्यकाळ आपणे सहियारी रीते
आपणो गमतो बनावीशु…”

हु मोढेथी वचन नही आपु,मारी आंखोमां वांची लो,
शु तमोने झळहळतुं आपणु भविष्य देखाय छे..?

मारी आंखोने वांचीने ए कहे छे,
आवा मनुष्यनी बुध्धिने जगत नमे-
मनुष्य स्वभाव पारखवानी तमारी शकित गजबनी छे
मारी भाषामां मारा जेवा माणस लागो छो..”
पण क्यारेक
आंखनी भाषाथी जरा आगळ वधो
ह्रदयनी भाषा वांचवानी तस्दी आपो
ह्रदय तो वापरे ज किंमत वधे छे.”
एनी वाकछट्टा साथेनो अदभूत अवाजनो
सामनो थता अंते ह्रदय बोलवा मजबूर थइ गयुं.

पछी ए आगळ बोली,

तमारा कलप्ना प्रदेशनी सुंदरीओ बहुं सुंदर होय छे,
ने एमने सुंदर बनाववामां शब्दोना रंग भरवा
कलाकारने सष्टानो आंनद होय मळतो होय छे
तमारी ए कलप्नामूर्ति वास्तविक जगतमां
शु तमारा जीवनमां जोवा मांगो छो खरा?

में फकत एटलु कह्यु,”अत्यार सुधी एने तो जोतो हतो
अने सांभळतो हतो..”

मारी वात सांभळीने पहेलीवार ए स्त्रीमां मुग्धतानी
मार्दवता एना स्निग्ध चहेरा पर फेलाती जोइ..
नीचे जोइने ए बोली,”शु तमे पण मजाक करो छो,
हु तमारी कल्पनामूर्तिने लायक थइ शकु एवो एक पण
अंश धरावती नथी..”

एनी चहेराने हडपचीथी जरा उचो करी अने आंख मांडी
ने मे कह्यु,”

“महोतरमा,कल्पनाना टाकणाथी आरसनी मूर्तिमां सुंदरतानो
पूर्ण विकाश कोतरी शकाय…पण
मारे तो लागणीना टाकणाथी जींवत सौंदर्यनी मूर्तिमां
शब्दोनां रंगो भरी नवो आकार आपवानो छे…
अने ए नवो आकार मारी कल्पनामूर्तिथी वधु
जाजरमान,देदीप्याम अने द्रश्यप्रिय हशे…”

जवाबमां एने कह्यु?
जो आ सौभाग्य मने मळतुं तो आजथी
महोतरमाने तमारी रीते कंडारवानी छुट आपु छु
पण
खरो सहचार साथे ह्रदयनी विशाळता,
अंतरनी उंडी समज,
निखालसपणु अने
प्रियना दोषोने चलावी लेवानी वृति
एनाथी पण उपर एने प्रिय करवानी
कला उपर रचाय छे
बे ह्रदयनु एक होवानु एक होवानुं
मजबूत बंधननु काव्य…
-नरेश के.डॉडीया
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