एक सिक्कानी बे बाजु जेवा आपणे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

एक सिक्कानी बे बाजु जेवा आपणे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
एक सिक्कानी बे बाजु जेवा आपणे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
एक सिक्कानी बे बाजु जेवा आपणे
कोइने कोइ समये बेमांथी एके तो
कोइ एकनो भार खमतो रहेवो पडे छे
घणी वार ए सिक्को उछळे छे..छतां
पण आपणे अकंबंध रहीए छीए..
तूटी नथी जता के ना कदी
आपणे एक बीजाथी छुटा पडी शकतां

आपणु अस्तित्व डाळी उगेलु फूल नथी
कोइ आवीने तोडी जाय के सुंधी जाय

आपणु अस्तित्व फूल परनी झाकळ नथी
के बपोरे सुरजना तापे ओगळी जाय

आपणु अस्तित्व संबंधोना दावे जोडायेलु नथी
के कागळ पर फारगतीना नामे कारगत थाय

आपणु अस्तित्व रसमोना नाते बंधायेलु नथी
के कोइ धार्मिक कारणोसर विक्षेप सहन करवो पडे

आपणु अस्तित्व कोइ परिसिमा सुधी सिमित नथी
के के जेनो एक अंत शरूआतथी नक्की थयेलो होय

आपनु अस्तित्व दिल अने दिमाग जेवु नथी
के जेथी करीने कोइ एकनी मनमानी चलाववी पडे

अने सौथी मोटी वात..ज्यारे ज्यारे ए सिक्काने
उछाळवामां आवे छे त्यारे ए ज रणको संभळाय छे
एकत्व खणखणतो नक्कर अवाज…
अने ज्यारे आपणे ओगळवानो समय आवशे त्यारे
पण सहियारू ओगळवानु नक्की छे….

ए ज कारखानामां ज्यां आ सिक्कानी उत्पति थइ हती
त्या ज ओगळी जशुअने फरीथी आपणे
एक नवा सिक्कामानी बे बाजु थइने
नवी नक्कोर उजळी छाप साथे दुनिया सामे आवीशु

हवे खबर पडीने व्हाली "महोतरमा"
आपणु अस्तित्व एटले छुटा पडवा माटे नथी
बल्के एक बीजाने साथे ज ओगळी जवा माटे सर्जायेलु छे
-नरेश के.डॉडीया

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