तुं मने रोज रोज कहे छे हुं तने प्रेम करूं छुं, Gujrati Kavita By Naresh K. Dodia

तुं मने रोज रोज कहे छे हुं तने प्रेम करूं छुं, Gujrati Kavita By Naresh K. Dodia
तुं मने रोज रोज कहे छे हुं तने प्रेम करूं छुं, Gujrati Kavita By Naresh K. Dodia
तुं मने रोज रोज कहे छे हुं तने प्रेम करूं छुं,
चाल आजे थोडो समय छे तो तुं समजाव के प्रेम एटले शुं?”

“व्हाली,तुं कहे छे के थोडो समय छे,अने तारे प्रेमने समजवो छे?”

”तुं तो कवि छे
समयने पण शब्दोमां बांधीने उतारी शके छे
तो प्रेम जेवी बाबत आसानीथी समजावी शके छे”

में हसतां हसतां व्हालीने जवाब आप्यो,

“मानवी पछीनां ८४ अवतारोमां हुं किटकथी लइने प्राणी बनीने
तने प्रेम करतो रह्यो अने आपणे अबोल जीवो प्रेमनी
अनुभुती करता रह्यां

अने मानवीनो अवतार आव्यो अने वाचा मळी ऍटले
८४ अवतार पछी पुछे छे के -”प्रेम एटले शुं?”

एनो हाथ मारा हाथमां लइने थोडो दबावीने पुछ्युं
हवे समजायुं के प्रेम एटले शुं!”

कशुं ज ना बोली शकी,एनी आंखो बंध थइ गइ
मारा बीजा हाथने हाथमां लइ,एनां कानमां में कह्युं,  

“ज्यां आइ लव युं के हुं तने प्रेम करूं छुं एवुं कहेवानी जरूर रहेती नथी
जेने भाषा,कविता के देश के सरहदोनो पनो टुको पडे छे
एने कदाच प्रेम कहेतां हशे."

कदाच ! आपणी वच्चे कंइक आवुं ज छे”
थोडी हसीने बोली,"कदाच ! आपणी वच्चे कंइक आवुं ज छे,
... हे ने...?"

में फरीथी एनो हाथ थोडो दबावीने कह्युं – “हा!सखत छे तारो प्रेम”
जें ८४ अवतारो पछी पण समजमा ना आव्यो के आ प्रेम शुं छे?
- नरेश के.डॉडीया
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