कुछ बरसो पहेले उस को अलफाजो का दोरा पडा था Hindi Kavita By Naresh K. Dodia

कुछ बरसो पहेले उस को अलफाजो का दोरा पडा था Hindi Kavita By Naresh K. Dodia
कुछ बरसो पहेले उस को अलफाजो का दोरा पडा था Hindi Kavita By Naresh K. Dodia
कुछ बरसो पहेले उस को अलफाजो का दोरा पडा था
घंटे भर बेठी रहेती थी अकेली सी कुछ सोच मे
कया लिखु?
कैसे लिखु?
कहा से शुरुआत करुं…?

कितनी मस्कत की लेकिन कुछ अलफाज नही निकले
तब किसीने बताया के तेरे पास “तनहाइआ”नही है
उस ने पुछा,’कहा मिलती है.?”
किसीने बताया के उस के बेचनेवाले आंखो से नही दिखते
वोह लोग दिल की नजरवालो को दिखते है..

तुम्हे भी कोइ मिल जायेगा..
दिल की नजरे चोक्कना रखना..
एक दिन मुज पे नजर पड गइ…
ना जाने उस के दिल को क्यां हुवा
मुज से पुछ लिआ’
यहा तनहाइआ कहा मिलती है.”
मैने कहा तुम मुजे रोज मिला करो,
बाद मे बतांउंगा के तन्हाइआ कहा मिलती है..
वो बोली,"ठीक है,हम रोज मिला करेंगे."

ऐसे हि कुछ हप्ते,महिने बित गये
तब उस को मालुम पडा के तनहाइआ तो दिलो मे पलती है
वो बाजार मे नही मिलती..

आज कितने साल हो गया ,
मेरी तनहाइका कारोबारो अच्छा चलता है
एक ही खरीददार है,
मे सुबह से शाम तक तनहाइओ के दिलो मे जमा करता हुं
शाम को वो रोज आती है,
अपने दामन मे भरके चली जाती है

तनहाइओ की किमत रुपैयो मे लगती नही
जैसी तनहाइ वैसी उस की किमत वसुली जाती है
कभी एक दो,मुश्कान के बदले तनहाइ दे देता हुं
कभी घंटे दो बिठाता हु,बाते को बदले तनहाइआ दे देता हु
कभी तनहाइ लेने के हाथ बढाती है हाथ पकड लेता हु
और तनहाइ दे  देता हुं..और बोनस एक मुश्कान भी लेता हुं

मैने पुछा मेरी तनहाइओ का रोज क्यां करती है आप
महोतरमा बोली,"मुजे अलफाजो का दोरा पडा है,
उस के इलाज के लिए कोइ दिलदार की तनहाइ दवा मे काम आती है

आप पहेले ऐसे दिलदार है,जिस की तनहाइआ
मेरे इलाज के लिए काम आती है
बाकी नकलीमाल वाले का इस्तेहार पढ के मे थक सी गइ हुं
आप को किसी के पास अपनी तनहाइआ बेचने की जरूर नही है
मे अकेली ही काफी हु आप की सब तनहाइओ को
में अपनी जलवारेझ मुश्कान दे कर खरीद कर शकती हुं

तब से आज तक मेरी तनहाइआ का कारोबार अच्छा चलतां है
रोज सुबह से जमा की हुवी तनहाइआ शाम को बिक जाती है

कभी कभी कहेती है,
“एक मुश्कान की किमंत तुंम क्या जानो नरेनबाबु.”
तब मे मुश्काराता हुं…और कहेता हुं..”मेरी तनहाइ.”
-नरेश के.डॉडीया
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