एक धारी वातोनो कदी अंत ना आवे एनी साथे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

एक धारी वातोनो कदी अंत ना आवे एनी साथे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
एक धारी वातोनो कदी अंत ना आवे एनी साथे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
एक धारी वातोनो कदी अंत ना आवे एनी साथे
बस एनी साथे वातो चालती रहे सतत ने सतत

कारण के हुं पण आवुं ज कंइक इच्छतो होउ छुं
निखालसता अने मानवतानी महेकनो
ज्यां सतत गुंजारव थतो होय एवा मानवीनुं
सानिध्य कोने ना गमे..?

एनी प्रत्येक अदाथी लइने
एना प्रत्येक बोलायेला शब्दो पर
एनी खूबसूरतीनी अमिट छाप होय छे

खुल्ला सेम्पुं करेला वाळमांथी आवती
आदत पडी जाय एवी खूश्बु,

सुरेख कमनियता अने नजाकत
पगथी लइने एनी आंखोमां सुधी
एना शरीरनां प्रत्येक वळांको पर
कोइ बेनमुन इश्वरीय मानव सर्जननी साबिती आपे छे

बधा कहे छे समयने कदी भूलवो ना जोइए
अने एनां सानिध्यमां
एनां प्रत्येक चिवटपूर्वक बोलायेला शब्दोमां
एनी दरेक सेन्स ओफ हयुमरमां(वाचाळतां)
एनी परमसमिपे रही एनी प्रत्येक अदा नीहाळवामां
एनी निर्दोष बाळकी जेवी भाववाही आंखोमां
ए चाहत जतावे छे के मित्रतासभर वर्तन करे छे
एना मुल्यांकनमां…
हुं मारा समयने भूली जांउ छुं

दोस्तीना अगाढ सागरमां मरजीवानी जेम
अथाक प्रयत्नो पछी मने मळेला
आ अमुल्य मोतीनी वात ज कंइक और छे.

रोज मळवुं,रोज लडवुं,रोज सांकेतिक भाषाथी
एक बीजाने बाळकनी जेम चीडावता रहेवुं
बाळकनी जेम बालिस हरकतो करता रहेवुं अने
अंतमां एक बीजा विना चाले नही ए मोड पर अटकी जवुं

छतां पण एक पुरुष होवाने नाते
ज्यारें ए कोइ विचारमग्न स्थितीमां होय त्यारे एनी
झाकळ जेवी भीनी मुखमुद्रा,
आलिंगनमां भींसी नंखाय एवी देहलतानी एक एक रेखाने,
वारे वारे जीभ फेरवीने भीना होठ पर पलकारा मारता हास्यने
कपडा अने एनां रंगोनी चीवटने
चपळता पूर्वक चोरीने हुं जोयां करूं छुं

मारी आ क्रियां एने समजमां आवे त्यारे
मारी सामे अपलक नयने जोइ अने
एक मुग्धानी जेम शरमायने नीचुं जोइने हसे छे..

ए लागती हती त्रीसेक वर्षनी
कोइ देवांगनां के ऋषीवरने लोभावी शके एवी अपुर्वा
एटले तो मारा सानिध्यमां
एनी आंखोमां ऋषीवरोने लोभावतो मद छलकतो हशे?

मित्रतानी मार्दवता,मैत्रीभावनाने कोराणे मुकीने
एक कविनी केम कल्पनामां सरी जतो हतो..

ए कल्पनां पण केवी दाधारींगी..!!!
एना उज्ज्वल वर्णमां
एनी मदमाती अंजन आंजेली घेराती आंखोमां
एना तांबुलथी लालचोळ होय ए होठमां
एनी पुष्ट छतां आकर्षक देहकलामां
एक पौरुंषिक काव्यमय लय अने आकार बनीने
विलिन थइ जांउ
- नरेश के. डॉडीया
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