गमती व्यकितनुं ज सानिध्य पामवुं केम अघरुं होय छे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia

गमती व्यकितनुं ज सानिध्य पामवुं केम अघरुं होय छे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
गमती व्यकितनुं ज सानिध्य पामवुं केम अघरुं होय छे Gujarati Kavita By Naresh K. Dodia
क्यारेक अधुरूं होय छे तो क्यारेक मधुरूं होय छे तो पण
गमती व्यकितनुं ज सानिध्य पामवुं केम अघरुं होय छे

केम आवुं बनतुं आव्युं छे जमानाओथी
तने मळ्यां पछी केटली केटली वातो करीए छीये छतां
एक तरस,आश,झंखनां,तारा नामनो पारावार गुंजारव
सतत मनमां घुंटाया राखे छे

आ बधुं शुं छे!तने कांइ समजाय छे,मने नथी समजातुं?
सतत कलाकोना कलाको सुधी कोइ पण संचार माध्यम थकी
आपणे जोडायेला रहीये छीए,छता न समजाय एवुं बंधन

जे कदी तुटतुं नथी,सतत एक बीजा साथे जोडी राखे छे
अने हा!आ कोइ टेलिविझननी जाहेरातमां आवतुं कोइ
मजबूतीनुं बंधन नथी,एवी कोइ लोंखंडी साकळ नथी

तो आपणा वच्चेनां आ बंधनने कई मजबूती छे जे,
आपणे बंनेने एक अजोड बंधनथी जोडी राखे छे!

मित्रता,प्रेम,कोइ आगला जन्मनी लेणादेणी,आकर्षण?
अथवा आपणे जेने कही छीए के आ “ऋणानुंबंध” छे

साचुं कहुं व्हाली!आमानुं कशुं ज नथी जे आपणी वच्चे छे

मारी एक गझलनां शेर परथी याद आवे छे के,

कृष्ण,राम आव्या ए पहेलाना युगनी वात छे
महाकाव्य एक रचायुं,प्रेमनुं पहेलु मंगल हतुं

दरियो कदी नदीने मळ्यो ए पहेलानी वात छे
प्रथम वखत मळी ए रूप नदी जेवुं चंचल हतुं

कदाच कंइक नवुं ज बंधन छे जे आपणने जोडे छे

आ प्रेम नथी,जेनो विस्तार आपणा माटे टुको छे
आ मित्रता नथी,जेनो प्रसार आपणने न समावी शके
आ आकर्षण पण नथी,जे फकत शरीरॉने जोडे छे
आ ऋणानुंबंध नथी,जे कोइ ऋणनुं मोहताज छे
आ ज्न्मोनी लेणादेणी नथी,जेनी गणतरी शकय छे

मोहतरमां वाळनो झाटको आपीने फरमावे छे के,

“बस बस!कवि तुं बहुं बोले छे,सीधी ने सट वात”
प्रेमथी उच्च कक्षानुं,ऋणानुंबंधना ऋण उतारनारू
मित्रताथी वधुं मार्दवता,आकर्षणथी वधुं अकळावनारुं

तारुं अने मारुं पोतानुं,पोतिकु एक बंधन छे
जे कोइ पण संबधोनां बंधनमां बंधायेलु नथी

आ परिमाण अने परिसिमांनुं कोइ माप नथी
जेने कोइ एन्जीनयर पोताना नकशामा बतावी शके
- नरेश के. डॉडीया

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